महरम
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ज़िन्दगी के आफ़ाक़ पर खड़े ,
परिवार के दस्तूर में लिपटे |
मिलेगी एक तबस्सुम मुझे ,
निकालेगी हमें असीरी से ||
मात देगी मेरी आना ,
बनेगी मेरी वो मसीहा |
मोहब्बत के महरूम ना बना ,
तिश्ना है तो बस हमदम का ||
मेरे तख़य्युल की हूर ,
अब बनो मेरी नूर |
फ़तेह करना हे ये बयाबीन ,
उज़्र ना दो मेरे ज़ोहरा जबीन ||
इस इश्क़ की इब्तिदा
को इंतज़ार हे , पिहरवा
जज़्बा हे तुझे पाने का ,
अब तो बनो मेरी सावरिया ||
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The art of writing is so gracefully addressed here! This is so good!
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ReplyDeleteLoved it��